Changing faces of cinema Halls in Delhi – A photo documentation.

Abstract: An outing and an entry into unreal, Cinema halls are a space where tangents meet. The millionaire’s daughter falls for a taxi driver, a Muslim marries a Hindu, a hero becomes a villain, a villain renounces the world and the rickshaw drivers and the CEO’s watch the same film in the same hall at the same time, one in the lower stall and the other in the balcony. Changing times transformed this equation and stepped in the swanky Multiplexes with expensive tickets. On the screen the tangents still meet but reality is different. The chat stalls, samosas, pakodi, chana is replaced by Hot dogs, nachos and corn. From personal the administration has turned corporate and the analog projection has gone digital. But tucked away in lanes there still exist the old. Panting their way ahead. The photo documentation is an effort to document the multi-dimensional transformation that has come and is coming in the Cinema Hall space.

Bio: Nandita was born in Benaras where she did her schooling. From 1998-2000 she studied visual communication in National Institute of Fashion Technology, New Delhi and pursued a career in films and photography thereafter. Since 2004 she has been an independent filmmaker and photographer and has worked for organizations like DANIDA, CARE India and Max New York Life Insurance.

Email: ramannandita @ gmail.com

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28 February

दिल्ली और आसपास के सिनेमा हॉल कि सूची बनाने पर कुल ११४ सिनेमा घरो का
ऑकड़ा सामने आया । ईसमे से करीब १५ मल्टीपलेक्स है। मै यह विचार कर ही रही थी
कि सन्शोधन कहा से शुरु करु कि मुझे याद आया कि पी. वी. आर. प्रीया तो मेरे घर
के बगल मे ही है। सोचा कि क्यू ना यहीं से शुरुआत की जाय । एक साधारन से झोले
मे कैमरा रखा, कुछ फि़ल्म ली और चल पड़ी । अभी एकआद ही तसवीर ली होगी कि सिनेमा
हॉल के एक कार्यकर्ता ने आकर कहा कि बिना अनुमति के मै तसवीरे नही ले सकती हू ।
असल मे तो मै पी. वी. आर की ज़मीन पर थी ही नही, मै बसन्त लोक शैपिन्ग
कौमपलेक्स से पी. वी. आर का चित्र ले रही थी । एक बार तो मन हुआ कि बोलू पर
बेकार की बहस मे नही पड़ना चाहती थी और हॉल के अन्दर की तसवीरे भी तो लेनी थी
जिसके लिये अनुमती भी चाहिए थी, सो चुप चाप कैमरा झोले मे डाल मै घर वापस आ गयी
। आते ही पी. वी. आर. के मालिक अजय बिजली को मेल लिखा, कल ही उनका जवाब आया
जिसमे उन्होने छाया चित्रण की अनुमती दी है । इस बीच मै गुड़गाव के सिनेमा घरो
को देखने गयी । मल्टीपलेक्सो के बजाय छोटे हॉलो को पहले देखना निश्चित किया और
हाथ आया एक खजाना! जय नाम का एक सिनेमा हॉल । एक छोटा और साधारण हॉल जो इसी
फरवरी की सतरह तारीख को बन्द हुआ अब तोड़ा जा रहा है, मल्टीपलेक्स बनाने के लिये
। हथौड़े की ठक ठक के बीच जब हॉल मे कदम रखा तो अचम्भित रह गइ । टूटी हुइ छत से
आती सूरज की किरणें दीवार पर अनेक आकृतियाँ प्रतिबिम्बित कर रहीं थीं । परदे और
कुर्सीयों को निकाला जा चुका था और रोड़ी व पथ्रर के बीच बिखरे थे अनेक टिकट ।
एक्ज़िट का टूटा साइन मानो इन छोटे सिनेमा हॉलो के विलोप की और सन्केत कर रहा था
। बाकी के हॉलो का भी बुरा हाल था । शकुन्तला बन्द पड़ा था, अजय और राज में
टापलेस जैसी अशलील फिल्में लगी थीं और पायल जिसमे चिंगारी लगी थी सुनसान पड़ा था

इन हॉलो की तसवीरें मै जल्दि ही ब्लॉग पर डालूगी । अगली पोस्टिगं जल्दि
ही…

नन्दिता

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