न्यूज़ चैनलों का सत्यकथाकरण

सार: हिन्दी समाचार चैनलों के बदलते अंदाज़ और मिज़ाज पर एक नज़र है-न्यूज़ चैनलों का सत्यकथाकरण । शोध
में अस्सी के दशक की मशहूर अपराध पत्रिका सत्यकथा की तर्ज पर समाचार चैनलों में अपराध संबंधी
कार्यक्रमों की तादाद बढ़ने और ख़बरों को लेकर उनकी प्राथमिकता बदलने की वजह और उसके असर को
जानने की कोशिश की गई है। कार्यक्रमों के प्रस्तुतिकरण से लेकर भाषा तक में हो रहे बदलाव पर भी
नज़र रखी गई है। इसके अलावा, न्यूज़ चैनलों की दुनिया में प्रचलित एक खास शब्द ब ‘टीआरपी’ के
क्या,क्यों और कैसे को भी समझऩे की कोशिश की गई है।

परिचय– पीयूष पांडेय 1998-99 में अमर उजाला से कैरियर की शुरुआत लेकिन चंद महीने बाद सूचना तकनीक
में मास्टर डिग्री लेने के लिए नौकरी छोड़ी। हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स,जनसत्ता और अमर उजाला
समेत कई समाचार पत्रों में आईटी और एडवरटाइजिंग से जुड़े लेख प्रकाशित। डिग्री के बाद सॉफ्टवेयर
फील्ड में मन नहीं लगा तो दिल्ली में नवभारत टाइम्स के ऑनलाइन संस्करण में बतौर उप संपादक काम
किया । 2003 के अंत से एक राष्ट्रीय समाचार चैनल में बतौर प्रोड्यूसर काम जारी।

प्रस्तुति:

पीयूष पांडेय: न्यूज़ चैनलों का सत्यकथाकरण

प्राक्क्थन

भारत के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में यह आँखों को चौंधियाने वाला युग है। देश में टेलीविज़न की शुरुआत के दौर की बात तो दूर, 10-12 वर्ष पहले भी लोगों ने नहीं सोचा था कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस करवट बैठेगा। देश में इस वक़्त दस करोड़ से ज़्यादा घरों में टेलीविज़न पहुँच चुका है और क़रीब पाँच करोड़ घरों में केबल टीवी अपनी दस्तक दे चुका है। टेलीविज़न की इस तरह पहुँच का किसी को अंदाज़ नहीं था।

नये दौर में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में कई तरह के परिवर्तन हुए हैं। दूरदर्शन का एकाधिकार समाप्त हुआ, तो कई नए टेलीविज़न चैनल प्रसारण की दुनिया में अस्तित्व में आए। कार्यक्रमों के प्रसारण, उनकी गुणवत्ता और उनके कंटेंट से लेकर उनके प्रस्तुतिकरण में ढेरों बदलाव आए। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इस परिवर्तन के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण बात यह हुई, कि उदारीकरण के बाद इसके लिए एक बड़ा बाज़ार तैयार होने की प्रक्रिया शुरु हो गई। ये प्रक्रिया इतनी तेज़ी से आगे बढ़ी कि कुछ सालों में ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए बड़ा बाज़ार तैयार हो गया।

हज़ारों-करोड़ रुपये रुपी नए बाज़ार के फ़लक तले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का रंग-रुप और मक़सद पूरी तरह बदल गया। हालाँकि परिवर्तन पूरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हुआ (प्रिंट मीडिया में भी), लेकिन इस शोध में मैंने समाचार चैनलों में हुए बदलाव पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की है।

दरअसल समाचार चैनलों में सेटेलाइट युग में अभूतपूर्व परिवर्तन हुए, लेकिन इस दौर में भी 2003 के बाद का दौर ख़ासा अहम है। इस दौर में ही न्यूज़ चैनलों की संख्या में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई और प्रतिस्पर्धा का एक नया मैदान तैयार हुआ, जहाँ चैनल एक-दूसरे को पछाड़ने के लिए “मार” मचाए हुए हैं। इस मारामारी में ही न्यूज़ चैनलों के सत्यकथाकरण की प्रक्रिया भी शुरु हो गई।

उल्लेखनीय है कि मीडिया में सत्यकथाकरण एक मुहावरा है, जो लोकप्रिय अपराध पत्रिका “सत्यकथा” की तर्ज़ पर अख़बारों अथवा दूसरी पत्रिकाओं में समाचार और कहानियों को प्रकाशित करने को लेकर गढ़ा गया। 80 के दशक में सत्यकथा, मनोहर कहानियाँ और नूतन कहानियाँ जैसी अपराध पत्रिकाओं ने समाचार पत्रों और दूसरी पत्रिकाओं को भी प्रभावित किया। लेकिन, न्यूज़ चैनल अब पूरी तरह सत्यकथा की राह पर चल पड़े हैं।

इस शोध में मैंने न्यूज़ चैनलों के सत्यकथाकरण की इसी पूरी प्रक्रिया और कारकों की पड़ताल करने की कोशिश की है। इस बदलाव के समाचार चैनलों पर प्रभाव को जानने की कोशिश की है तथा इस राह की मंज़िल क्या होगी – इसे समझने की कोशिश की है।

इस समूचे शोध कार्य को मैंने 11 अध्यायों में विभाजित किया है।

पहला अध्याय : भारत में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया

इस अध्याय में भारत में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की शुरुआत के बारे में ज़िक्र किया गया है। भारत में कभी दूरदर्शन जैसा इकलौता चैनल हुआ करता था, यह बात नयी पीढ़ी के कई लोगों अनूठी लग सकती है। दरअसल, एमटीवी से लेकर डिस्कवरी चैनल और आजतक, स्टार न्यूज़ से लेकर ईटीवी, सनटीवी, एशिया टीवी और तमाम विदेशी चैनलों की चकाचौंध में जन्मी नयी पीढ़ी (कम-से-कम महानगरों और बड़े शहरों की) दूरदर्शन को भूल चुकी है। लेकिन, सच्चाई तो यही है कि भारत में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की क्रांति का पहला बिगुल दूरदर्शन के रुप में ही बजा था। इस बात को ध्यान में रखते हुए दूरदर्शन की शुरुआत से लेकर दूसरे दौर तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इतिहास को इस अध्याय में टटोला गया है।

दूसरा अध्याय :  इलेक्ट्रानिक मीडिया में न्यूज़

शोध के विषय का आधार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में समाचार हैं। समाचार चैनल नए दौर में 24 घंटे के हैं, जबकि कभी दूरदर्शन पर महज़ दो मिनट का समाचार बुलेटिन आया करता था। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हुए परिवर्तन के दौरान न्यूज़ कहाँ-से-कहाँ तक पहुँची और कैसे “न्यूज़ कैप्सूल” वीडियो पत्रकारिता के दौर से गुज़रते हुए 24 घंटे के न्यूज़ चैनल होने तक पहुँचे। इस अध्याय में संक्षिप्त में इस पूरे परिवर्तन पर नज़र डालने की कोशिश की गई है।

तीसरा अध्याय :  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में क्राइम रिपोर्टिंग

इस शोध में न्यूज़ चैनलों के सत्यकथाकरण की प्रक्रिया और वजह को जानने की कोशिश की गई है, जिसकी शुरुआत समझने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में क्राइम रिपोर्टिंग की शुरुआत को समझना आवश्यक है। इसके अलावा, यह समझना ज़रुरी है कि टेलीविज़न में कैसे अपराध पत्रकारिता परवान चढ़ी। इस तरह की वो चुनिंदा ख़बरें कौन-सी थीं, जिन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अपराध पत्रकारिता के लिए उर्वर ज़मीन तैयार की, जो भविष्य में सत्यकथाकरण की शुरुआत का आधार बनीं।

चौथा अध्याय :  सत्यकथा की सफलता

इस अध्याय में सत्तर और अस्सी के दशक की लोकप्रिय अपराध पत्रिका ”सत्यकथा” की शुरुआत और फिर उसकी सफलता पर नज़र डाली गई है। अगर सत्यकथाकरण एक मुहावरा बना तो इसकी वजह सत्यकथा की सफलता ही है, जिसने पूरी अपराध पत्रकारिता को अपने अंदाज़ में प्रभावित किया। इलाहाबाद के मित्र प्रकाशन की इस पत्रिका ने अपराध से जुड़ी ख़बरों में कथ्य का इस तरह समावेश किया कि लाखों लोग इस पत्रिका के दीवाने हो गए। बावजूद इसके, सत्यकथा कभी मुख्यधारा की पत्रिका न मानी गई, न बन सकी। न्यूज़ चैनलों में अपराध से जुड़ी ख़बरों को पेश करने का अंदाज़ कहीं-न-कहीं सत्यकथा से प्रेरित है, लिहाज़ा मैंने इस मशहूर पत्रिका के आरंभ, फिर लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचने और फिर ढलान की वजह समझना भी आवश्यक माना।

पाँचवा अध्याय  : न्यूज चैनलों का सत्यकथाकरण

इस अध्याय में न्यूज़ चैनलों के सत्यकथाकरण का विस्तार से अर्थ समझाने की कोशिश की गई है। इसके बाद, सत्यकथाकरण के कारकों को भी विस्तार से समझने-जानने की कोशिश है। न्यूज़ चैनलों का रुप-रंग और ढंग दो-ढाई साल में ही बदला है, लिहाज़ा यह समझने की गहन कोशिश की है कि समाचार चैनलों में वो कौन-से तत्व हैं, जिन्होंने न्यूज़ चैनलों के सत्यकथाकरण जैसी संज्ञा को जन्म दिया। इस अध्याय में समाचार चैनलों पर तेज़ी से बढ़ते क्राइम शो, उनकी संख्या और टेलीविज़न पर उनकी उपस्थिति पर नज़र डाली गई है। इसी तरह, समाचार चैनलों पर आने वाले भूतहा कार्यक्रमों पर विस्तार से नज़र डाली गई है। ऐसे कार्यक्रमों के आरंभ की और लोकप्रियता की पड़ताल की गई है। लेकिन, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में  “सत्यकथाकरण” सिर्फ अपराध और अलौलिक शक्तियों से जुड़ी ख़बरों की अधिक तादाद की वजह से इस्तेमाल नहीं किया गया, बल्कि समाचारों के कई दूसरे बदलते रुप भी सत्यकथाकरण के लिए ठोस ज़मीन तैयार करते रहे हैं। उदाहरण के लिए स्टिंग ऑपरेशन, जिनमे सनसनी फैलाने की भरपूर गुंजाइश रहती है। इसी तरह न्यूज़ चैनलों के लिए हाल में रिएलिटी शो भी फ़ायदे का सौदा साबित हुए हैं, लिहाज़ा रिएलिटी शो दिखाने की प्रवृत्ति चैनलों में तेज़ी से बढ़ी है। दरअसल, रिएलिटी शो में इंसान को बांधने के लिए हर वो भाव मौजूद होता है, जिससे चैनलों की टीआरपी बढ़ सकती है। इसके अलावा, चैनलों पर लगने वाली पंचायतें एक नए ट्रेंड की शुरुआत कर चुकी हैं।

छठा अध्याय :   ब्रेकिंग न्यूज़ सिण्ड्रोम

हिन्दी के तमाम समाचार चैनल इन दिनों ब्रेकिंग न्यूज़ देने की प्रतिस्पर्धा में ही जुटे हुए हैं। इस प्रतिस्पर्धा के चलते चैनल किसी भी समाचार को ब्रेकिंग न्यूज़ में तब्दील कर सकते हैं। सरकार की नयी योजना का प्रारुप हो, शहर में कहीं बलात्कार की घटना हो या कोई एमएमएस क्लिप; चैनल इन सभी समाचारों को ब्रेकिंग न्यूज़ कहकर प्रसारित करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि कई चैनल तो अब महज़ सूचनाओं को भी ब्रेकिंग न्यूज़ कह कर प्रसारित कर रहे हैं। हालाँकि, यह घटना पूरी तरह सत्यकथाकरण का हिस्सा नहीं कहीं जा सकती, लेकिन कहीं-न-कहीं यह उसी नीति का हिस्सा है जिसमें दर्शक को रोकने के लिए हर ख़बर को अहम बताने की होड़ और हर समाचार में सनसनी पैदा करने की चेष्टा है। इस अध्याय में यह जानने की कोशिश भी की गई है कि क्या न्यूज़ चैनलों को “ब्रेकिंग न्यूज़ सिण्ड्रोम” का शिकार होने का कुछ लाभ भी मिला है?

सातवाँ अध्याय : मेकिंग ऑफ़ अ क्राइम शो

इस शोध की परिकल्पना टेलीविज़न चैनलों पर बढ़ते क्राइम शो देखकर ही तैयार की गई थी। क्राइम शो किस तरह तैयार होता है, विचार की क्या भूमिका होती है और प्रस्तुतिकरण को इतना नाटकीय क्यों बनाया जाता है, ऐसे तमाम सवालों के उत्तर इस अध्याय में खोजने की कोशिश है। इसी दौरान उसकी पूरी निर्माण प्रक्रिया को समझऩे की कोशिश है, जिसमें पहले आईडिए से लेकर वीडियो एडिटिंग के महत्व तक की पड़ताल है। शोध के दौरान, सराय के लिए लिखी पोस्ट पढ़कर भी कुछ साथियों ने क्राइम शो की निर्माण-प्रक्रिया पर सवाल पूछे थे, जिन्हें शायद इस अध्याय में अपने जवाब मिल सकेंगे।

आठवाँ अध्याय : सत्यकथाकरण की वजह

इस अध्याय तक आते-आते शोध अपने निष्कर्ष की तरफ़ पहुँचने की शुरुआत करता दिखता है। इस अध्याय में न्यूज़ चैनलों में हुए इस पूरे बदलाव को समझने की गंभीर कोशिश की गई है। टीआरपी यानि “टेलीविज़न रेटिंग प्वाइंट” का चैनलों के लिए महत्व से लेकर बाज़ार के दबाव तक तमाम कारणों को समझऩे की कोशिश है। हालाँकि विषय इतना विस्तृत और जटिल है कि इसके लिए सिर्फ़ कुछ कारकों को ज़िम्मेदार ठहराना नादानी होगी, लेकिन समाचार चैनलों के प्रमुख लोगों, मीडिया समीक्षकों, दर्शकों, मीडिया एजेंसियों के लोगों से बात करने और अपने तर्क, अपनी समझ के बाद चार-पाँच मुख्य वजह साफ़-साफ़ दिखायी दे रही हैं; जो न्यूज़ चैनलों के बदलाव की वजह बने हैं। इस अध्याय में इन्हीं वजहों का ज़िक्र और पड़ताल है।

नौंवाँ अध्याय : टीआरपी – हक़ीक़त या फ़साना

टेलीविज़न रेटिंग प्वाइंट यानि टीआरपी टेलीविज़न चैनलों पर कार्यक्रमों की लोकप्रियता नापने का पैमाना है। टीआरपी के ज़रिए ही दर्शकों की रुचि का आंकलन भी किया जाता है। “टीआरपी” न्यूज़ चैनलों की दुनिया में ऐसा शब्द बनकर उभरा है, जिसे हल्की भाषा में “माई-बाप” कहा जा सकता है।
टीआरपी क्या, क्यों और कैसे – यह इस अध्याय का विषय है। टीआरपी की विश्वसनीयता कई वजहों से संदेह के घेर में है। इनमें छोटा सैंपल और पीपुल मीटर की कार्यपद्धति जैसी संदेह की कई वजहें हैं। इन वजहों का अध्याय में विस्तार से ज़िक्र है। इसके अलावा, क्यों न्यूज़ चैनल टीआरपी नाम के खूँटे से बंधे हुए हैं – जानने की पड़ताल भी करता है यह अध्याय।

दसवाँ अध्याय  : सत्यकथाकरण का प्रभाव

हिन्दी न्यूज़ चैनलों में भयंकर प्रतिस्पर्धा के चलते इतनी अधिक मारा-मारी है, कि सभी चैनल हर हाल में आगे निकलना चाहते हैं। इस पूरी जल्दबाज़ी में न्यूज़ चैनल गंभीर पत्रकारिता का आवरण छोड़ हल्के और सस्ते चैनल दिखायी देने लगते हैं। लेकिन, असल परेशानी इस प्रक्रिया के प्रभाव की वजह से है। न्यूज़ चैनलों के सत्यकथाकरण के चलते सामाजिक सरोकार हाशिए पर चले गए हैं। सेंटर फ़ॉर मीडिया स्टडीज़ के अध्ययन के मुताबिक़ सन् 2005 में हिन्दी के 24 घंटे वाले न्यूज़ चैनलों में गाँव-देहात की ख़बरों को महज़ चार फ़ीसदी जगह मिल सकीं, जबकि चार महानगरों यानि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे मेट्रो शहरों की ख़बरों को 60 फ़ीसदी जगह मिली। चिंताजनक बात यह कि स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, लिंगभेद और बच्चों से जुड़े समाचारों को कुल बुलेटिन का चार फ़ीसदी से भी कम वक़्त मिला। चैनलों पर अहम ख़बरों के लिए भी जगह कम होती दिख रही है, जबकि तिल का ताड़ कैसे बनाया जाए – यह न्यूज़ चैनलों को बखूबी पता होता है। इस “तान दो” प्रवृत्ति का सबसे बड़ा नुक़सान यह है कि कई समाचार जल्दबाज़ी में बिना औपचारिक पुष्टि के और बिना उनका प्रभाव समझे तान दिए जाते हैं। दरअसल, समाचार चैनलों के बदलते रुप ने कंटेट को बुरी तरह प्रभावित किया है और इसका असर कई रुपों में दिखायी दे रहा है। वर्तमान दौर में न्यूज़ चैनल एकलौती इसी रणनीति पर काम करते दिखायी देते हैं कि किसी छोटी-सी ख़बर को इतना उछाल दो (चैनलों की भाषा में “तान दो”) कि सभी दूसरी ख़बरें उसके आगे बौनी लगें। इस अध्याय में न्यूज़ चैनलों के सत्यकथाकरण के प्रभाव की विवेचना का प्रयास किया गया है।

अंतिम अध्याय : निष्कर्ष

इस पूरे शोध के दौरान लगातार यह सवाल मन में रहा रहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आज जिस तरह के हालात हैं, क्या वो ऐसे ही बने रहेंगे। न्यूज़ चैनलों पर बढ़ते क्राइम शो को देखकर शुरु हुए इस शोध के दौरान हालात बिगड़ते दिखे – विचार, अँदाज़, कंटेंट और प्रस्तुतिकरण सभी स्तर पर। हालाँकि ऐसा क़तई नहीं है कि न्यूज़ चैनल कुछ अच्छा कर ही नहीं रहे हैं। न्यूज़ चैनल कई बार बेहद प्रभावी और अहम भूमिका निभाते नज़र आते हैं, लेकिन इन चैनलों को जिस तरह की भूमिका निभानी चाहिए, वो निभाते नहीं दिख रहे। टेलीविजन पर अच्छा क्या हुआ – इस बारे में भी इस अध्याय में संक्षिप्त ज़िक्र है लेकिन सवाल अच्छे का नहीं बल्कि बिगड़ते की पड़ताल का था। आवश्यकता यह जानने की थी कि क्या हालत सुधारने की कोई ज़रुरत है? अगर ज़रुरत है तो क्या संभावना है? न्यूज़ चैनलों के बेलगाम दौड़ते घोड़ों को क़ाबू में लाने के लिए कोई कोशिश करनी होगी या ये घोड़े 200-400 किलोमीटर की रफ़्तार से दौड़ने के बाद थक-हारकर खुद ही अस्तबल में लौट आएंगे। न्यूज़ चैनलों के सत्यकथाकरण की प्रक्रिया, वजह, प्रभाव आदि की विवेचना के बाद निकलकर आए निष्कर्षों को इस अध्याय में समेटने की कोशिश की गई है।

शोध प्रक्रिया :

अकादमिक शोध के लिए आवश्यक अनुभव की कमी मुझे इस शोध के दौरान प्रतीत हुई। इसके बावजूद, मैंने अपनी समझ और अपने अँदाज़ से शोध को पूर्ण किया है। इस शोध का विषय ऐसा था कि इस पर पुस्तकें बेहद कम थीं, अलबत्ता समाचार पत्रों में इस विषय पर ज़रुर कुछ लेख आदि प्रकाशित हुए। इन लेखों, शोध से जुड़े प्रकाशित समाचारों के अलावा समाचार चैनलों के कई दिग्गजों (एक्जिक्यूटिव प्रोड्यूसर, प्रोड्यूसर, एंकर, क्राइम रिपोर्टर आदि) और मीडिया समीक्षकों की मदद ने शोध को अपनी मंज़िल तक पहुँचाया। समाचार पत्रों से जुड़े कुछ वरिष्ठ पत्रकारों ने भी ख़ासी मदद की। इसके अलावा, क्राइम से जुड़े कार्यक्रमों के बारे में ब्लॉग और ई-मेल के ज़रिए किए गए सर्वे के नतीजे ने भी जनता की राय जानने में मेरी मदद की। बावजूद इसके, इस विषय पर शोध करते-करते कई ऐसे सवाल भी मन में घुमड़े, जिनका उत्तर जानना अभी बाक़ी है; यानि इस विषय में शोध की अभी काफी संभावनाएँ शेष हैं।

पीयूष पांडे
फेलो, सराय-सीएसडीएस इंडिपेंडेण्ट फ़ैलोशिप 2006

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