शोध-सार:

मुस्लिम माहिलाओं की उर्दू पत्रिकाएँ

औरत को आधी दुनिया माना जाता है। एक औरत का पढ़ा-लिखा होना एक नस्ल का
पढ़ा-लिखा होना समझा जाता है। इसलिए कि उसकी गोद में पूरी एक नस्ल पतली
और बढ़ती है। उसकी सूझ-बूझ का पूरा-पूरा असर आनेवाली नस्ल पर पड़ता है।
आज की औरत ने बहुत तरक्की कर ली है मगर कुछ मामलों में मुस्लिम औरतें आज
भी समय से बहुत पीछे हैं––और वो है उनकी सोच की सतह। उनकी सोच की इस सतह
को प्रभावित करती हैं और कई मुस्लिम महिलाओं की पत्रिकाएँ। जो उन्हें एक
दायरे के अन्दर रखी हुई हैं जहाँ समय की आहट बहुत कम सुनाई देती है। आज
की बदलती दुनिया से इन पत्रिकाओं का रिश्ता बहुत मज़बूत नहीं बन पा रहा
है।
इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए मैं मुस्लिम माहिलाओं की पत्रिकाओं
की करते हुए उनका comparative study Hindi Female’S Megazines से की है।
परिचय:

मैंने जेएनयू से 2005 में पी-एच. डी. की है। मेरा विषय A Comparative
study of Urdu-Hindi Novel 1980-2000 है। मैंने एम. फिल. A Comparative
study of Sohail Azeemabadi and Phanishwarnath Renu पर किया है। उर्दू
एवं हिन्दी के कई साहित्यिक पत्रिकाओं और अख़बार में मेरे लेख और
समीक्षाएँ छपे हैं। NCPUL की मासिक पत्रिका ‘उर्दू दुनिया’ के लिए मैंने
दिल्ली और दूसरे प्रदेशों के ढ़ेर सारे रचनाकारों, समाजसेवी लोगों के
इंटरव्यू लिए हैं जो ‘उर्दू दुनिया’ में छपे हैं।
इसके अलावा मैं ऑल इंडिया रेडियो External Service Division  में Casual
Announcer की हैसियत से काम करता हूँ। इन दिनों एक साहित्यिक पत्रिका
‘परिकथा’ में सहसम्पादक की जिम्मेदारी और फ़र्ज़ को अदा कर रहा हूँ।

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